आचार्य भिक्षु

तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु श्रमण परंपरा के महान संवाहक थे। उनका जन्म वि. स. १७८३ आषाढ़ शुक्ला त्रयोदच्ची को कंटालिया (मारवाड़) में हुआ। उनके पिता का नाम शाह बल्लुजी तथा माता का नाम दींपा बाई था। उनकी जाति ओसवाल तथा वंच्च सकलेचा था। आचार्य भिक्षु का जन्म-नाम भीखण था। प्रारंभ से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। तत्कालीन परंपरा के अनुसार छोटी उम्र में ही उनका विवाह हो गया। वैवाहिक जीवन से बंधे जाने पर भी उनका जीवन वैराग्य भावना से ओतप्रोत था। धार्मिकता उनकी रगरग में रमी थी। पत्नी भी उन्हें धार्मिक विचारों वाली मिली। पति-पत्नी दोंनो ही दिक्षा लेने के उद्यत हुए, किंतु नियति को शायद यह मान्य नहीं था। कुछ वर्षो के बाद पत्नी का देहावसान हो गया। भीखणजी अकेले ही दिक्षा लेने को उद्यत हुए, पर माता ने दीक्षा की अनुमति नहीं दी। तत्कालीन स्थानकवासी संप्रदाय के आचार्य श्री रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने कहा - महाराज! मैं इसे दीक्षा की अनुमति कैसे दे सकती हूं क्योंकि जब यह गर्भ में था तब मैंने सिंह का स्वप्न देखा था। उस स्वप्न के अनुसार यह बडा होकर किसी देच्च का राजा बनेगा। और सिंह जैसा प्रकृमि होगा। आचार्य रघुनाथ जी ने कहा बाई यह तो बहुत अच्छी बात है। राजा तो एक देच्च में पुजा जाता है। तेरा बेटा तो साधु बन कर सारे जगत का पुज्य बनेगा। और सिंह कि तरह गुजेगा। इस प्रकार आचार्य रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने सहर्ष दिक्षा की अनुमति दे दी। वि.स. १८०८ मार्गच्चीर्ष कृष्णा बारस को भीखणजी ने आचार्य रघुनाथजी के पास दीक्षा ग्रहण की। संत भीखण जी की दृष्टि पेनि और मेघा सूक्षमग्राही थी। तत्व की गहराई में पैठना उनकी लिए स्वाभाविक बात थी। थोड़े ही वर्षो में वे जैन शास्त्रों के पारगामी पंडित बन गये।

वि.स.१८१५ के आस पास संत भीखणजी के मस्तिष्क में साधु वर्ग के आचार विचार संबन्धि च्चिथिलता के प्रति एक क्रांति की भावना पैदा हुई। उन्होंने अपने क्रांति पूर्ण विचारों को आचार्य रघुनाथजी के सामने रखा। दो वर्ष तक विचार विमर्च्च होता रहा। जब कोई संतोषजनक निर्णय नहीं हुआ तब विचार भेद के कारण वि.स. १८१७ चैत्र शुक्ला नवमी को कुछ साधुओं सहित बगड़ी (मारवाड़) में उनसे पृथक हो गये। उनकी धर्म क्रांति का विरोध हुआ। चुकि उस समय पुज्य रघुनाथ जी का प्रभाव प्रबल था। इस लिए लोगो ने भीखणजी का असहयोग किया। ठहरने के लिए स्थान नहीं दिया। वहां से विहार किया। गांव के बाहर आये कि तेज आंधी आ गई। इतो व्याघ्रस्ततस्तटी वाली कहावत घटित हो गई। पीछे गांव में जगह नहीं, आगे आंधी ने रास्ता रोक लिया। इस लिए उन्होंने पहला पडाव गांव के बाहर शमच्चान में जैतसिंहजी की छतरियों में किया। आज भी वे छतरीयां विद्यमान है।
संघबहिष्कार के साथ ही आचार्य भीक्षु पर जैसे विरोधों के पहाड टुट पडे। पर वे लोह पुरूष थे। विरोधे के सामने झुकना उन्होंने सिखा नहीं था। वे सत्य के महान उपासक थे। सत्य के प्राण न्यौछावर करने के लिए वे तत्‌पर थे। उन्ही के मुख से निकले हुए शब्द आत्मा राकारज सारस्यां मर पुरा देस्यां, सत्य के प्रति आगद्य संपूर्ण के सुचक है। वे महान आत्मबलि वे जीवन में सुध साधुता को प्रतिष्ठित करना चाहते थे। वि. स. १८१७ आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को केलवा(मेवाड़) में बारह साथियों सहित उन्होंने शास्त्र सम्मत दीक्षा ग्रहण की। यही तेरापंथ स्थापना का प्रथम दिन था। इसी दिन आचार्य भीक्षु के नेतृत्व में एक सुसंगठित साधु संघ का सूत्र पात हुआ और वह संघ तेरापंथ के नाम से प्रखयात हो गया।

वि.स.१८१७ से लेकर वि.स. १८३१ तक पन्द्रह वर्ष का जीवन आचार्य भीक्षु का महान संघ संघर्षमय रहा। यहां तक कहा जाता है कि उन्हें पांच वर्ष पेट भर आहार बहुत कम मिलता। कभी मिलता कभी नहीं भी मिलता। इस महान संघर्ष की स्थति में आचार्य भीक्षु ने कठोर साधना, तपस्या, शास्त्रों का गंभीर अध्यन एवं संघ की भावी रूप रेखा का चिंतन किया।
वि.स. १८३२ में आचार्य भिक्षु ने अपने प्रमुख च्चिष्य भारमल जी को अपना उतराधिकारी घोषित किया। उसी समय संघीय मर्यादाओं का भी निर्माण किया। उन्होंने पहला मर्यादा पत्र इसी वर्ष मार्ग शीर्ष कृष्णा सप्तमी को लिखा। उसके बाद समय समय पर नई मर्यादाओं के निमार्ण से संघ को सुदृढ करते रहे। उन्होंने अन्तिम मर्यादा पत्र लिखा स. १८५९ माद्य शुक्ला सप्तमी को। एक आचार्य में संघ की शक्ति को केन्द्रित कर उन्होंने सुदृढ संगठन की निव डाली। इससे अपने अपने च्चिक्षय बनाने की परंपरा का विच्छेद हो गया। भावी आचार्य के चुनाव का दायित्व भी उन्होंने वर्तमान आचार्य को सौंपा। आज तेरापंथ धर्म संघ अनुच्चासित मर्यादित और व्यवस्थित धर्म संघ है, इसका श्रेय आचार्य भिक्षु कृत इन्हीं मर्यादाओं को है।
आचार्य भिक्षु ने अपने मौलिक चिंतन के आधार पर नये मूल्यों की स्थापना की। हिंसा व दान-दया संबंधी उनकी व्याख्या सर्वथा वैज्ञानिक कही जा सकती है।
आचार्य भिक्षु की अहिंसा सार्वभौमिक क्षमता पर आधारित थी। बडों के लिए छोटो की हिंसा और पंचेन्द्रिय जीवों की सुरक्षा के लिए एकेन्द्रिय प्राणीयों का हनन आचार्य भिक्षु की दृष्टि में आगम समस्त नहीं था।
अध्यात्म व व्यवहार की भूमिका भी उनकी भिन्न थी। उन्होंने कभी ओर किसी भी प्रसंग पर दोंनो को एक तुला से तोलने का प्रयत्न नहीं किया। उनके अभिमत से व्यवहार व अध्यात्म को सर्वत्र एक कर देना घी ओर तम्बाकू के सम्मिश्रण जैसा अनुपादय है।
दान दया के विषय में लैकिक एवं लौकतर भेद रेखा प्रस्तुत कर आचार्य भिक्षु ने जैन समाज में प्रचलित मान्यता के समक्ष नया चिंतन प्रस्तुत किया। उस समय समाजिक समान का माप दण्ड दान दया पर अवलंबित था। सर्वर्गोपलब्धि और पुण्योपलब्धि की मान्यताएं भी दान दया के साथ जुडी हुई थी। आचार्य भिक्षु ने लौकिक दान दया की व्यवस्था को कर्तव्य व सहयोग बता कर मौलिक सत्य का उद्घाटन किया। साधय साधन के विषय में भी उनका दृष्टिकोण स्वष्ट था। उनके अभिमत से सुध साधन के द्वारा ही सुध साधय की प्राप्ती सम्भव है। उन्होंने कहा रक्त से सना वस्त्र कभी रक्त से शुद्ध नहीं होता। वैसे ही हिंसा प्रधान प्रवृति कभी अध्यात्म के पावन लक्ष्य तक नहीं पहुचा सकती।
आचार्य भिक्षु एक कुच्चल विधिवकता होने के साथ साथ एक सहज कवि और महान साहित्यकार थे। उन्होंने राजस्थानी भाषा में लगभग ३८००० पद्यों की रचना कर जैन साहित्य को समर्ध किया। आचार्य भिक्षु की साहित्य रचना का प्रमुख विषय सुध आचार का प्रतिपादन, तत्व दर्च्चन का विच्चलेषण एवं धर्म संघ की मौलिक मर्यादाओं का निरूपर्ण था। उनकी रचनाओं में प्राचीन वेराग्य में आख्यान भी निबद्ध है। आचार्य भिक्षु ने कभी कवि बनने का प्रयत्न नहीं किया और न कभी उन्होंने भाषा शास्त्र, छनद शास्त्र, अलंकार शास्त्र एवं रस शास्त्र का प्रच्चिक्षण ही प्राप्त किया पर उनके द्वारा रचे गये पद्यों में रस, अनुप्रयास और अलंकारों के प्रायोग पाठक को मुगध कर देते है। आचार्य भिक्षु के साहित्य को पठ कर आधुनिक विद्वान उन्हें हिगल ओर काण्ट की तुला से तोलते है।
आचार्य भिक्षु जब तक जिए, जयोति बनकर जिए। उनके जीवन का हर पृष्ठ पुरुषार्थ की गौरवमयी गाथाओं से भरा पड़ा है।
आचार्य भिक्षु के शासन काल में ४९ साधु और ५६ साध्वियां दीक्षित हुई। वि.स. १८६० भाद्रव शुक्ला त्रयोदच्ची के दिन सिरियारी (मारवाड़) में उन्होंने समाधि मरण प्राप्त किया। उस समय उनकी आयु ७७ वर्ष की थी।