हमारी दुनिया में सब कुछ परिवर्तनशील नहीं होता, कुछ शाश्वत भी होता है। प्रकृति शाश्वत है। मनुष्य की प्रकृति भी शाश्वत है। उसमें आदतें हैं और आदतों के हेतु - क्रोध, मान, माया, लोभ आदि तत्व हैं। अच्छाई नई नहीं हैं, बुराई भी नई नहीं है। ये सब चिरकालीन हैं। केवल इनका रूप बदलता रहता है। पदार्थ बदलते हैं। दुनिया बदलती है। फिर मनुष्य क्यों नहीं बदलता ? अणुव्रत बदलने का दर्शन है। मनुष्य अपनी प्रकृति का निरीक्षण करे, उसे समझे और उसमें परिवर्तन लाने के लिए अभ्यास करे, अणुव्रत इसीलिए है।
हिंसा कोई नई समस्या नहीं है। हजारों वर्ष पहले हिंसा होती थी, आज भी होती है। वह जीवन के साथ जुड़ी हुई है। इसलिए सब लोग पूर्ण अहिंसा का जीवन का जी सके, यह सम्भव नहीं है। एक रास्ता पूर्ण अहिंसा का है दूसरा रास्ता पूर्ण हिंसा का है। पूर्ण हिंसा का जीवन व्यक्ति और समाज दोनों के लिए श्रेष्टकर नहीं है। भगवान महावीर ने एक नया रास्ता सुझाया उन्होंने कहा पूर्ण हिंसा न छोड सको तो कम से कम किसी मनुष्य पशु आदि को संकल्प पूर्ण मत मरो। अणुव्रत की भाषा इतनी है। पर इसकी भावाना व्यपक है। उसके अनुसार किसी छोटे से छोटे प्राणी की भी अनावश्यक हिंसा न की जाये। स्वस्थ समाज रचना और पर्यावरण कर दृष्टी से महत्व पूर्ण है। अहिंसा का अणुव्रत
हिंसा व्यक्ति में होती है उसका प्रस्फोट होता है समाजिक क्षेत्र में। अहिंसा का बीज विधमान है। इसलिए कोई निमित मिलता है। और हिंसा फुट पडती है। उपद्रव और तोड़ फोड़ मुल्क प्रवृतियां प्रारम्भ हो जाती है।
हिंसा के ना रूप है उसका एक भया वह रूप है धृणा। उसे पलवन देने वाले रूप है अहंकार। मनुष्य धृणा और अहंकार के तत्व नहीं होते तो मनुष्य जाति विभक्त नहीं होती। वर्ण ओर जाति के आधार पर छुआ छुत एवं उन्च निच का भाव नहीं पनपता।
आश्चर्य है कि सुर्य उगा प्रकाश देने के लिए ओर वह भी अंधकार उगलने लगा। धर्म का उदय हुआ मिटाने के लिए, किन्तु वही हिंसा को प्रोतसाहन देने लगा। धर्म जीवन का सर्वोपरी तत्व है। वह निचे दब गया सम्प्रदाय का कटरता उस पर हावी हो गई। इसी कारण धर्म के नाम पर हिंसा को बढ़ावा मिला इतिहास में सौकडों सौकडों पृष्ट धर्म के नाम पर हुई हिंसा के रक्त से रनजित है।
नैतिकता शुन्य धर्म ने धार्मिक कटरता को बढावा दिया। धर्म गौण हो गया सम्प्रदाय मुख्य हो गये ।अपेक्षा यह की धर्म मुख्य रहें और सम्प्रदाय गौण हो। इस संदर्भ में अणुव्रत ने एक नया दृष्टिकोण दिया। उसने सम्प्रदायमुक्त धर्म की अवधारणा दी। अणुव्रत केवल धर्म है, वह सम्प्रदाय नहीं है, किसी सम्प्रदाय से जुड़ा भी नहीं है। यह जैन, बौद्ध, वेदिक, इस्लाम और ईसाई धर्म नहीं है। इस दृष्टि से इसे निर्विशेषण धर्म कहा जाता है।
धर्म हो और नैतिकता न हो,यह बुद्धिगमय नहीं होती। किन्तु नैतिकता विहिन धर्म को मान्यता मिल गई। इसीलिए एक धार्मिक व्यक्ति भी अपने व्यापार का व्यसाय में अप्रामाणिकता बरतता है। आश्चर्य है कि एक व्यक्ति प्रमाणिक अथवा नैतिक हुऐ बिना ही धार्मिक बन जाता है। अणुव्रत ने इस भ्रातिं को तोडने का प्रर्यत्न किया है और एक स्वर दिया है कि व्यक्ति नैतिक हुए बिना धार्मिक नहीं बन सकता।
उपासना धर्मारधना का माध्यम है। केवल उपासना के बल पर ही धार्मिक बनने वालों ने उपासना को प्रधान बना दिया और धर्म को गौण कर दिया उपासना के केन्द्र संधर्ष के केन्द्र बन गये। अणुव्रत ने धोषणा की उपासना का स्थान दूसरा है प्रथम स्थान धर्म का है।
सामाजिक जीवन और शिक्षण जगत में भी संयम उपेक्षित हो रहा है। फलस्वरूप मादक वस्तुओं का सेवन, द्यूत आदि व्यसन और सामाजिक कुरूढ़ियां अपने पांव फैला रही है। विद्यार्थी को प्रारंभ से ही प्रायोगिक रूप में संयमः खलु जीवनम् यह धोष सिखा दिया जाए और सामाजिक जीवन में उसे प्रतिष्ठित कर दिया जाए तो जीवन को नई दिशा और नया आयाम मिल सकता है। च्चिक्षा के क्षेत्र में जीवन विज्ञान के प्रयोग को मूल्य देने और सम्मिलित करने का यही उद्देश्य है।
हिंसा का एक नया रूप विकसित हो गया है - चुनाव के दंगल में होने वाला अनैतिक आचरण। चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ है। रीढ़ ही बीमार हो जाए तो स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना किस आधार पर टिकेगी ?
बीसवीं शताब्दी समाजवादी अवधारणा की शताब्दी रही। इस शताब्दी ने समाजवाद की अवधारणा को उदात किया, फलस्वरूप सभी दिशाओं से स्वस्थ समाज रचना की कल्पना सामने आ रही है। अणुव्रत का दृष्टिकोण मुख्य रूप से व्यक्ति- निमार्ण अथवा व्यक्ति के चरित्र-निमार्ण का है। समाज संरचना का संकल्प उसके सामने उतरखंड के रूप में है।
किसी भी प्रवृति, कार्यक्रम, संस्था, समाज अथवा राष्ट्र का संचालन करने वाला व्यक्ति होता है। उस व्यक्ति का चरित्र-निमार्ण न हो तो अच्छी से अच्छी व्यवस्था भी लड़खड़ा जाती है। व्यक्ति के चरित्र निमार्ण का प्रयत्न बुनियादि सच्चाई है। अणुव्रत इन सच्चाई को सामने रख कर चल रहा है। इसकी धोषणा है सुधरे व्यक्ति सामाज व्यक्ति से राष्ट्र स्वयं सुधरेगा। व्यक्ति के सुधार से समाज का सुधार संभव है। समाज सुधरेगा की यात्रा राष्ट्र सुधार की दिशा में आगे बढती है। समाज और राष्ट्र निमार्ण का सपना पुरी तरह से व्यक्ति निमार्ण पर टिका हुआ है। व्यक्ति का चरित्र निमार्ण अणुव्रत दर्श का मुल आधार है।